Sunday, May 8, 2022
ॐ सुधा सिन्हा --कथा -- बीच का रास्ता 25 जून 2020
बीच का रास्ता
सडक पक्की है। उसके दोनों ओर दो गाँव हैं। पहले, बहुत
पहले यह एक ही जनपद था जिसमें एक ही मूल-गोत्र के
लोग बसते थे। और यह सडक ? यहतो एक पगडंडी
थी; बरसात में डूब-डाब कर खो जाया करती थी और लोगों
की चहलकदमी से फिर उभर आती थी।
इसकी खोयी खुशहाल एकता का इतिहास पुराना है। उसके
बाद की बातें बेहद मटमैली हैं; याद करने लायक बिल्कुल
ही नहीं। यदि सोच में उभर आयें, तो क्लेष होता है। जिन
जख्मों पर पपडियां पड गयी हैं, उन्हें नाहक रिसने और
टीसते रखने केलिए कुरेदने से फायदा ?
उत्तर से दक्षिण की ओर जाने वाली इस सडक के पूरब है
हिन्दुओं का गाँव और पश्चिम तरफ है मुसलमानी बस्ती।
इन दोनों भागों के बाशिन्दों के दादा-परदादा के दादा के
दादा एक ही थे। इस सत्य को जान-बूझ कर टाल दिया
जाता है। बल्कि दोनों समूह ऐसा बनावटी व्यवहार करते हैं
जैसे एक ओर के लोग आसमान से टपक पडे और दूसरी
ओर वाले धरती फोड कर प्रकट हो गये।
यहाँ की दिल दहला देने वाली खामोश कहानियां बहुत कुछ
कहती हैं...जिनके मुँह में जोर-जबरदस्ती औरंगजेब के गुर्गो
ने गोमांस ठूंस दिया, वे मुसलमान बनने को मजबूर हुए
या उसके बहुत पहले अकबर के समय में ही ओहदा पाने
का लालच देकर अनेक युवको को ले गये और मामूली
खादिम बना कर कलमा पढा दिया। एक ही माँ का जाया
कहानियां सच्ची-मुच्ची
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एक भाई हिन्दू रहा तो दूसरा भ्रष्टता ओढ कर रोता-गाता
दूसरी ओर चला गया। अनेक दर्दनाक दैत्य कथायें यहाँ की
हवा को भारी बनाये रहती हैं। दुर्घटना चाहे कैसी भी रही
हो, यह सच है कि सडक के दोनों ओर की जिन्दगी दो
किस्म की है।
हिन्दुओं के गाँव में सुहाना सिंदूरी रंग है, तो मुसलमानों
की बस्ती को स्याह मनहूसियत ने अपनी गिरफ्त में
जकड रखा है। ऐसा नहीं कि सडक ने बीच में आकर यह
विभेद उपजाया हो; यह तो अभी हाल ही में पक्की हुई है,
हिन्दू मुसलमान के बीच का फासला तो हजार बरस से
पथराया हुआ है। जैसे ही कोई हिन्दू मुसलमान बना दिया
जाता है, उसी क्षण उसकी भौतिक सत्ता में तात्विक हीनता
घर कर लेती है; मानव विकास की प्रक्रिया उल्टी दिशा में
मुड कर पतन की ओर बढ जाती है। फिर भी, यह बख्ती
सतही अंतर रक्त तक नहीं पहुँचा है।
*
हिन्दुओं के गाँव में अधिकांश मकान पक्के हैं जिनमें आधे
से अधिक दुतल्ले होंगे। इधर के लोग हर साल दीवाली कें
पहले अपने घरों की रँगाई-पुताई कराते हैं। श्रावन में
हनुमानजी की नयी ध्वजा लगती है और कार्तिक मास में
तुलसीजी का नवीकरण होता है। गोवर्धन पूजा में मवेशियों
के गले की पुरानी रस्सी हटाकर नयी डाली जाती है, उनके
लिए नये खूंटे गाडे जाते हैं और चरबाहों को नयी धोतियां
मिलती हैं। देवोत्थान एकादशी के पहले ठाकुरबाडी को
चकाचक कर दिया जाता है; ऊपर लगा पीतल का कलश
सोने-सा चमकने लगता है। यहाँ हर संध्या आरती के
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समय घडी-घंटा ध्वनि जब गाँव में इस कोने से उस कोने
तक गनगना उठती है, तब जो जहाँ होता है, वहीं हाथ
जोड कर माथे से लगाता है, अपने को उस समवेत प्रार्थना
में सम्मिलित अनुभव करता है। तीज में स्त्रियों की
सजधज देखते ही बनती है और उसके दूसरे दिन गणेश
चतुर्थी शिक्षकों का जलसा बन कर बच्चों को हर्षाने लगती
है। सदा पुनर्नवित होने वाले अश्वत्थ वृक्ष को घेर कर
बनाया गया चबूतरा गाँव के अदृश्य रक्षक ब्रह्मबाबा का
निवास स्थान है। अक्षय तृतीया को यह पवित्र चबूतरा
चंदन-रोली से सजाया-सँवारा जाता है। महाशिवरात्रि के बाद
से ही ''फगुआ'' का रंग चढने लगता है। होलिकादहन और
उसके दूसरे दिन का रंगोत्सव सारे गाँव को उमंग के रंग
में भिँगो देता है। विश्वकर्मा पूजा कर्मियों का त्योहार माना
जाता है। इसके लिए कर्मी दलों के बीच चंदा मांगने की
होड लग जाती है। लोग औकात भर दिल खोल कर देते
भी हैं, क्योंकि सब चाहते हैं कि पूजा धूम-धाम से
सम्पन्न हो। सारे गाँव को अनन्त चतुर्दशी की प्रतीक्षा
रहती है जब पुरोहित साल भर पुरानी डोर खोल कर नयी
बाँधेंगे। श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के
अष्टयाम कीर्तनों के मौके पर तो ठाकुरबाडी परिसर में
तिल धरने की जगह नहीं होती। और, शरद नवरात्र में
''मैया'' के मंदिर की शोभा देखने केलिए गाँव भर के लोग
खिंचे चले आते हैं। इस अवसर पर मंदिर के आसपास की
सडकों के दोनों किनारे एक पखवारे केलिए टाट-टप्पर डाल
कर दूकानें खडी कर ली जाती हैं। यहीं लोग दीपावली
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केलिए सजावट के सामानों की खरीदारी करते हैं। वार्षिक
सफाई का काम तो दस दिन पहले ही शुरु हो जाता है।
कहीं महालक्ष्मी तो कहीं महाकाली पूजन के साथ
दीपमालिका से जगमगाता गाँव स्वयं अपनी शोभा पर
इतरा उठता है। दीवाली के पहले घर-द्वार, बरतन-भाँडे
साफ करते समय नजर ''छठ'' व्रत पर रहती है। यह व्रतों
का राजा है; कोई भूल-चूक नहीं हो इसकी सावधानी बनी
रहती है। कार्तिक-स्नान के समापन और संक्रान्ति के
तिल-गुड को लेकर उत्साह की उष्णता के पीछे रहती है
ऋतु परिवर्तन की कारीगरी। ''जूड-शीतल'' गर्मी के स्वागत
की तैयारी कराता है। बहनें रक्षाबंधन और भ्रातृद्वितिया
की प्रतीक्षा करती है; यद्यपि उनके मन में अपने भाइयों
केलिए सदा ही शुभकामनायें बनी रहती हैं, पर त्योहारों की
बात ही कुछ और है। वे चाहे ससुराल में हों या मायके में,
समवेत स्वर में ''जीअहुँ हो मोर भइआ, जिउ भइआ लाख
बरीसे'' गाकर आनन्द मग्न हो उठती हैं।
इन व्रत-त्योहारों और उत्सवों के पीछे छिपे वास्तविक तत्त्व
ने इस गाँव को दी है एक अक्षुण्ण जीवन्तता। पनपने और
विकसित होने की स्वस्थ-सबल प्रवृत्ति के साथ यहाँ के
बच्चे पढ-लिख कर कमाऊ पूत बनना चाहते हैं। उनकी
सौम्य अभिलाषा का साथ देती है ''ॐ नम: सिद्धं'' की
सूक्ष्म शक्ति; तभी तो वे अल्प साधनों के बावजूद नगरों
में जाकर, सुयोग्य और उपयोगी बन पाते हैं। असुविधाओं
से यहाँ के बालक और युवा नहीं घबडाते। इनके आदर्श
अर्जुन हैं; इन्होंने सही लक्ष्य पर अपनी दृष्टि टिकाये रखने
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का अभ्यास कर लिया है। ये अल्प सफल हों या अति
सफल, इनके कारण गाँव की हैसियत बढी है। अब इस
गाँव के लोग बीमार पडने पर बडे अस्पतालों में इलाज
कराने की हैसियत रखते हैं। यहाँ शुभविवाह का आयोजन
हर्ष-उल्लास से होता है। साफ नजर आता है कि तरक्की
मुस्करा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।*सडक के
पश्चिम वाली बस्ती में एक ही मकान पक्का है-- मस्जिद
का। बाकी घर कच्चे और बेमरम्मत हैं। अब तो दोनों ओर
की जनसंख्या लगभग एक जैसी ही होगी, लेकिन शुरू से
ऐसा नहीं था। जो लोग मुसलमान बना दिये गये थे,
उनकी तदाद हिन्दुओं से काफी कम थी। जब एक आदमी
चार-चार औरतों से बच्चे पैदा कराने लगा तब बात-की-
बात में उनकी तादाद बढ गयी। उनके लिए अनिवार्य
बनायी गयीं कुप्रवृत्तियों की सूची में सबसे पहले नम्बर पर
है हिन्दू को अपना शत्रु मानना और उसे नुकसान पहुँचाने
में लगे रहना। मजहब के नाम पर अखाद्य भक्षण के
साथ अनेक अशौच आदतें डाली गयीं, फलत: उनके बीच
भयंकर बीमारियाँ पैदा होने लगीं। चचेरे-फुफेरे-ममेरे भाई-
बहनों के बीच की गयी शादियों ने रही-सही कसर पूरी कर
दी; औलादों में विकलांगता आने लगी, शरीर से लेकर
आचार-विचार में भी। कमियों और सीमाओं से निकलने के
बदले उन्होने विषकीडा की तरह अपने चारों ओर मलिनता
का खोल बना लिया। अशिक्षा, जडता, रोग और भोग से
आक्रान्त, उस मुसलमानी बस्ती में हर सही बात मजहब
के खिलाफ मानी जाती है।
*
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उस अंधेरी बस्ती में कल रात टॅार्च ने खलबली मचा दी।
'क्या हुआ ?''पुलिस के लोग आये थे।'
'पुलिस ? क्यों ?'
'कासिम को हथकडी पिन्हा कर ले गये हैं।'
'कासिम तो कुछ दिनों से दिखायी नहीं दे रहा था !'
'हाँ, उसका बाप कहता है कि कहीं काम पर लगा था; पैसे
भी भेजता था। इधर उनलोगों की हालत सुधर गयी थी।
सुना कि परसों रात अचानक आ गया।'
'तो, पुलिस क्यों ले गयी?''वह पाकिस्तान में आतंकी बनने
की ट्रेनिंग ले रहा था।'
'ऐं ?''आतंकियों का सरगना बन कर लौटा है। उसके
जिम्मे काम है भारत के युवाओं को आतंकवादी दल का
मेम्बर बनाना, उनके लिए ट्रेनिंग कैम्प लगाना और खास-
खास जगहों में हमले कराना।''वह पकडा कैसे गया ?'
'सरकार की तीसरी आँख से नहीं बच पाया। देश के दूसरे
हिस्सों में भी ऐसे छोकडे पकडे गये हैं।'
'अच्छा, तो इसी को लेकर कांग्रेस और काम्युनिस्ट रुदाली
बने हुए हैं। उनका कहना है कि बीजेपी मासूम मुसलमानों
को अकारण परेशान कर रही है।'
'कासिम की माँ को भी बेटा मासूम ही लग रहा है।'*
'बच्चे को क्यों जाने दिया था पाकिस्तान ?' कासिम की
माँ अपने शौहर को कोसती हुई सिर पीट कर रो रही है।
'मेरे रोकने से रुकता ?' बाप अपना बचाव करता है।
'क्यों नहीं रुकता ? रोका कब ? पूछा तक नहीं कि क्यों
जा रहा है।'
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'एक वही तो नहीं है कि नजर गडा कर बैठा रहता।'सही
कहा उसने। चार मौजूदा बीबियों से चौबीस और तीन
तलीक दी हुई की छह औलादी पलटन में किस-किस पर
नजर रखी जाये ?'कम-से-कम यह पूछते कि पाकिस्तान
क्यों जा रहे हो?'
'खुद ही बोला था कि यहाँ रह कर क्या करूँगा।'
'वहाँ जाकर क्या बन गया ... जान पर बन आयी !'
'बहुत लडके पकडे गये है.. सब मुसलमान।'
'मेरा मतलब सिर्फ अपने बेटे से है।''सब छूट जायेंगे.. यह
भी छूट जायेगा।''जो पैरवी करेगा वह अपने बच्चों को छुडा
लेगा। इस तरह हाथ-पर-हाथ धर कर बैठने वाले का बच्चा
छूटेगा ?''पैरवी करने की मेरी औकात नहीं है।'
बीबी के मन में बडी तल्ख बातें उठ रही थीं, लेकिन उसने
अपने को रोक लिया और बेचैनी से बोली--'एम एल ए से
मिलते।' उसी इलाके का एक आदमी कांग्रेस पार्टी का
विधायक था।'पता करता हूँ; वह यहाँ कम ही रहता
है।'कासिम का बाप एम एल ए से मिल कर आया तो
बहुत झुँझलाया हुआ था।
'क्या हुआ ?' बीबी ने पूछा तो और बौखला गया।'होना
क्या है ? सब-के-सब बेशरम हैं, झूठ बोल कर बेवकूफ
बनाना चाहते हैं।''आखिर कहा क्या ?''कहेगा क्या ? पैसे
मांगता है। कहता है कि बेटे को छुडाना है तो गाँठ ढीली
कर ! जैसे यहाँ कोई कारूँ का खजाना गडा है ! दो जून
की रोटी का जुगाड किस मुश्किल से हो पाता है यह तो
किसी को बता नहीं सकता। रिश्वत देने केलिए क्या डाका
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डालूँ ? और, पैसे लेकर भी वह कुछ कर सकेगा क्या ?
आज तो कांग्रेस का राज-पाट भी खतम हो चुका है; जब
यहाँ से वहाँ तक कांग्रेसी फैले हुए थे तब भी कसाब को
बचा पाये ? सारी उछल-कूद धरी रह गयी और वह फाँसी
पर लटका ही दिया गया।'
कासिम की माँ पुक्का फाड कर रोने लगी। अब तक जो
नहीं जानते थे उन्हें भी पता हो गया कि मामला देशद्रोह
का है। ऐसे में कोई पूछ-ताछ भी नहीं करता। सन्नाटे में
रोने की आवाज अधिक डरावनी लगती है।
*
'उनके रोने से कुछ होने वाला नहीं है; उन्हें शिक्षित होने
की जरूरत है ताकि दहशतगर्द पैदा न करें।'
'कौन देगा उन्हें ऐसी शिक्षा ?'
'वक्त।'*मौसम बदल गया है। सडक मे पूरव एक अभूतपूर्व
उष्णता से अनुप्राणित वातावरण जनगण के मन में
बदलाव ला रहा है। उनमें आक्रोश है । एक संकल्प भी है।
विपरीत स्थिति को मातृभूमि के अनुकूल करने में सहयोग
देने का अनकहा दृढ निश्चय आबालवृद्ध नर-नारी के
व्यक्तित्व में उजास भर रहा है।
सूचनायें मिल रही हैं; कासिम से मिले सूत्र पर अनेक
आतंकी पकडे गये। उनके पास से अकूत विस्फोटक और
असले बरामद हुए। देशहित में कार्यरत शीर्षस्थ व्यक्तियों
की हत्या करने का नक्शाबन्द प्रोग्राम भी मिला। उत्खनन
का यह सिलसिला अभी चल ही रहा है। राष्ट्रविरोधी
बदबोली वालों के हलक सूख रहे हैं। कुचालियों के पैर के
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नीचे की जमीन खिसक रही है। खामख्याली में गर्क लोगों
का हकीकत से सामना होने लगा है।
*
दो भिन्न मनोभावों के बीच से गुजरती यह सडक शर्म से
पानी-पानी हो रही है। उसे पता है कि अब लडाई आरपार
की है; इसमें बीच का कोई रास्ता नहीं है।
तथास्तु
सुधा9047021019
ॐ सुधा सिन्हा -- पिछडापन व 'जातिप्रथा'
Oxford Dictionary में लिखा है-- जात
any of the Hindu hereditary classes whose members
have no social contact with other classes.
बोलचाल में उस जनसमूह को पिछडा कहा जाता रहा है जिनके बीच औपचारिक शिक्षा की कमी है और जिनके जिम्मे तथाकथित मंद व्यवसाय है। पिछडापन सामाजिक अपमान माना जाता था।'
'लेकिन अब तो ऐेसा लगता है जैसे आरक्षण कोई तोहफा हो या सूद सहित मिलने वाला हरजाना।'
'लेकिन मुफ्त का विशेषाधिकार पाने केलिए अपनी हीनता को महिमामंडित करने की राजनैतिक नौटंकी देखते-देखते देश ऊब चुका है। अब तो ऐसा सुनने का मन होता है कि लोग आरक्षण लेने से मना कर दें।'
'बिल्कुल। और, यही होगा। अंतत: आत्मसम्मान जगेगा ही।'
'और, स्वयं को उत्तिष्ठ करने का महत्व समझ में आयेगा, तब खैरात लेना अपमानजनक हो जायेगा।'
'सही कहा। यह तो विकास की अनिवार्यता भी है।'
'लेकिन निचले स्तर की राजनैतिक हरकतों ने सारी सूक्ष्म-स्थूल अनिवार्यताओ और सम्भावनाओं को दर-किनार कर दिया है। अगडा-पिछडा का सामाजिक विभेद चुनाव जीतने का राजनैतिक हथकंडा बन कर रह गया। समाज के पिछडे समूह की काल्पनिक कमियों केलिए ऊँची दीर्घा में बैठे अगडों को कोसा जाने लगा। दलितों के धनकुबेर दलालों ने इस संदर्भ में एक नया राजनैतिक शब्द--'मनुवादी'-- गाली की तरह उछाला है।'
'पिछडेपन का निर्धारण किया किसने?'
'संविधान के मूल पाठ में Schedule Cast और Schedule Tribe' अंकित है और इसे ही सूचिबद्ध किया गया है। आरक्षण इन्हीं केलिए है। देश का वह बहुसंख्यक जनगण जो इस आरक्षण के कारण राजनैतिक वंचना का शिकार हो रहा था, भारी मन से ही सही, इसे सहने को तैयार हो गया था। यदि राजनैतिक इच्छा-शक्ति और प्रशासनिक कुशलता सक्रिय रही होती तो दस या पन्द्रह वर्षो में किसी लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता था। परन्तु अब तो तथाकथित 'पिछडा' शैतान की आँत बन कर सब कुछ हडप लेने को मुँह फाडता ही जा रहा है।'
'ठीक कहा। आजादी के बाद सत्ता पर काबिज राजनेताओं में इच्छा-शक्ति का अभाव तो था ही, उन्होंने आरक्षण को छद्म प्रेम-प्रदर्शन का दिखावटी झुनझुना बना लिया। जिस Schedule Cast और Schedule Tribe' जनसमूह को देश के सामान्य जनगण के साथ जोडना था, उसे और भी अलग कर दिया। सामान्य लोगों में उनके प्रति उत्तरदायित्व बोध जगाने के बदले, उनके बीच शोषित-शोषक का वैमणस्य पैदा करा दिया। नतीजा यह हुआ कि इस मामले में जनसहयोग शून्य बना रहा।'
'हाँ, जब देश में 'Other Backward Classes' का हंगामा शुरू हुआ, तब तो स्थिति और द्वन्द्वात्मक हो गयी। राजनैतिक इरादा इतना अपघाती था कि सारे देश में इस अनीति के विरुद्ध मुकदमे दायर हो गये। 'योग्य' को अपनी योग्यता व्यर्थ लगने लगी थी क्योंकि अयोग्यता का प्रमाणपत्र विशेष सुविधायें दिलाने लगा। तीव्र बुद्धि की चमक मंद बुद्धि के सामने नगण्य मानी गयी। जनगण के बीच फैले असंतोष से भी अधिक देश की जो हानि हो रही थी उसका आकलन नहीं किया जा सकता।'
'अनेक प्रकार की वर्ग भिन्नता होने के बावजूद भारत में कोई जाति संघर्ष नहीं था। जातिगत व्यावसायिक व्यवस्था के अंतर्गत लोग समरसता से जीवन यापन करते थे।'
'हाँ, यह अविश्वसनीय लगता है। परन्तु है सत्य। इसके पीछे एक सूक्ष्म तत्त्व काम करता था। यह जो एक कथन है कि it happens only in India, वह इस पर भी लागू होता है। जातिगत विभेद होने पर भी सामाजिक समरसता एक रहस्य सा लगता है। इस 'सम' को सींचता रहा है आध्यात्मिकता का अमृत 'रस'। विकृति के बावजूद वर्ण व्यवस्था की अवधारणा जातिप्रथा के मूल में बनी रही। बाहरी पहचान पर भले ही जाति हावी हो गयी हो, परन्तु व्यक्ति की अमरता का सूक्ष्म परिचय पत्र निरस्त नंहीं हुआ, बना रहा।'
'भारत के सामाजिक जीवन के बहुरंगी पट में 'जाति' ने अपना ताना-बाना डाल रखा है यह जानते हुए भी संविधान निर्माता ने जातिमुक्त समाज की कल्पना की, जाति व्यवस्था समाप्त करने का मन बनाया?'
'हाँ, वे जानते थे कि यहाँ जाति-संघर्ष नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि जातिप्रथा में कोई दोष नहीं था या दलितों-वंचितों के प्रति अन्याय नहीं होता था। हमारे महान देश का बहुत बडा जन समूह अपमान और अभाव के दंश झेलता आ रहा था। और, यह भी सत्य है कि जाति के नाम पर होने वाला भेदभाव देश को कुरूप तथा कमजोर बना चुका था। इसीलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के दलितों-वंचितों को सामान्य दीर्घा तक पहुँचाने हेतु आरक्षण को एक कारगर उपाय मानकर लागू किया गया। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य था असमानता का समापन।
'दलित-वंचित जन आज भी भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा, आत्मा की अमरता में विश्वास करता है! उस स्तर पर तो समानता है ही।'
'यह आध्यात्मिक अवदान प्रत्येक भारतीय को जन्मजात थाती के रूप में उपलब्ध है; यह कोई सांसारिक विरासत नहीं है। इस महत्त्वपूर्ण एक्य के बावजूद व्यावहारिक स्तर पर वस्तुस्थिति विपरीत है। आध्यात्मिकता नीँव में बनी रही, परन्तु सतह पर खडी दीवारों में दरारें पड गयीं। मिलावट के कारण दोष उत्पन्न हुआ। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं कि भारत का सामान्य जनगण भी जीवन की सूक्ष्म निरन्तरता की बात जानता है, वह मानता है कि हम में-तुम में-खर में-खम्भ में भगवान की उपस्थिति है, यह भी जानता है कि सब एक ही तत्त्व से बने है। तब प्रश्न यह उठता है कि कोई अछूत कैसे बना दिया गया? इस आपत्तिजनक बात पर तो सवाल उठना ही चाहिए। ऊँच-नीच का भेद तो मिटना ही चाहिए।'
'हाँ, इसीलिए विचारकों ने जातिमुक्त समाज की आवश्यकता अनुभव की। इसे सम्भव बनाने केलिए उन्होंने आरक्षण का सहारा लिया। उनका अनुमान था कि इससे दलित-वंचित सामान्य दीर्घा में आ जायेंगे। परन्तु उनका आकलन धरा रह गया। जो जातिप्रथा स्वयं धुँधलाते-धुँधलाते non functional हो जाती़, वह नये लक्षणों के साथ drug resist पुराने रोग की तरह उभर कर समाज को ज्वरग्रस्त करने लगी; आरक्षण समाजिक रोग की बदपरहेजी बन गया।'
'आरक्षण को 'हाइजैक' कर लिया राजलोलुप सत्तामाफीआ ने। असली उद्देश्य से इसे पूरी तरह वियुक्त कर बिकाऊ चीज बना दिया।'
'वर्तमान समय में आरक्षण के जो स्वघोषित ठीकेदार दिखाई दे रहे है उनमें न तो लोकसंग्रह का भाव है और न किसी तरह की सकारात्मक क्षमता है। आरक्षण को मुद्दा बना कर वे राजसत्ता पाने की अपनी अपआकांक्षा पूरी करना चाहते हैं। इसके लिए वे किसी भी सुखी-सम्पन्न जनसमूह के मन में मिथ्या असंतोष भर कर 'आरक्षण' दिलवाने का झूठा वादा करते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ निकम्मे लोग ईंट या पत्थर पर सिन्दूर पोत कर जनसंकुल स्थान में बैठ जाते हैं; कीर्त्तन-भजन, पूजा-आरती करने लगते है। उनकी इस हरकत से अकसर आवागमन बाधित होता है। दरअसल, उनका इरादा रहता है जमीन हथियाना। उसी तरह आरक्षण के बिचौलिये राजनीति की जमीन पर नाजायज कब्जा करने केलिए यह कपट जाल बिछाते हैं। राष्ट्रीय विकास को बाधित करने वाले इस आरक्षण माफीआपशु को देश का जनगण घास नहीं डालेगा।'
(जारी..)
आरक्षण का प्रावधान दलित-वंचित-पिछडा की स्थिति बदलने केलिए था, परन्तु इसे धौंस भरा विशेषाधिकार बना दिया गया। यह उद्दंडों की दादागिरी का एक यंत्र बन गया। इस हालत से निकालने की बात तो दूर, इसमें शामिल होने केलिए बहुरूपिये लाइन में खडे हो गये। आरक्षण राजनीति के under world का काला धंधा बन गया। दलित-वंचित-पिछडा बनने केलिए लोगों को उकसाने वाले दलाल राजनेता महलों में राजसी सुख भोगने लगे। दलित-वंचित-पिछडा जन समूह को राजनैतिक कारखाने का कच्चा माल बना दिया गया।'
'आरक्षण के प्रसंग में 'क्रीमी लेयर' की बात आती है। यह एक अलग किस्म की कालाबाजारी है। जिसे दलित-वंचित-पिछडा का प्रमाणपत्र मिल गया, वह करोडपति हो या उच्चपद आसीन, अपने तथा अपनी अयोग्य संतानों केलिए आरक्षण के सारे लाभ समेट लेता है। वह भ्रष्ट, जुगाडू व्यक्ति या परिवार अपनी जाति के भी जरूरतमंदों को ठगता है। चालाक बिल्ली की तरह सारी मलाई चाट जाने वाले उस तथाकथित दलित-वंचित-पिछडे शठ को 'क्रीमी लेयर' का कीडा माना जाता है।'
'क्या कभी इसी प्रकार की विकृतियां वर्णव्यवस्था के अंतर्गत भी हुई होंगी?'
'सम्भव है वह भी शुद्धिकरण की एक प्रक्रिया रही हो! मानव क्रमविकास को ध्यान में रख कर संरचित वर्ण व्यवस्था की विकृति .... '
'कहाँ आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संघटित वर्ण व्यवस्था और कहाँ यह सामाजिक रोगजन्य आरक्षण ! दोनों के बीच कोई साम्य नहीं है।'
'सारे रोग-दोष निश्चेतना से ही निकल कर आते हैं। जो प्रकटत: दोष बन कर आता है, अकसर उसमें भी निहित होता है शत-प्रतिशत शुद्ध बनने का उद्देश्य। नकारात्मक तत्त्व भी सकारात्मकता को सम्भव बनाने का कारक बन जाता है।'
'यह भारतीय दृष्टिकोण है।'
'इसे भारतीय दृष्टिकोण कह कर सीमाबद्ध न करें। यह शाश्वत-सार्वभौम तथ्य है। जहाँ कहीं सत्य स्थापित होता है, मिथ्या झाँकने लगती है। हमें भले ही बाधा की असुविधा होती हो, परन्तु यह है अपने को बदलने केलिए उसकी आकुल संचेष्टा।'
'हाँ, निश्चेतना सार्वभौम है। परन्तु आज की जातिप्रथा 'वर्ण' की जिस अवधारणा पर आधारित है, वह तो भारतभूमि की ही देन है; ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्ण का उल्लेख है। इसके मूल में 'वृ' है जिसका अर्थ है चुनना या पसंद करना। यह अंग्रेजी के choice का पर्यायवाची माना जा सकता है। यानी व्यक्ति अपने लिए वर्ण चुन सकता था।'
'परन्तु ऐसा नहीं लगता कि वर्ण चुनना पूरी तरह व्यक्ति के अपने अधिकार में था। स्वेच्छा से किसी वर्ण में प्रवेश करना सहज नहीं था। इसके लिए उसकी जन्मजात क्षमता, प्रयत्नशील उद्यम, अर्जित योग्यता और सबसे अधिक अभीप्सा की भूमिका रहा करती थी। ऐसा ही एक प्रसंग 'हरिवंश पुराण' में है; नभगरिष्ठ नामक एक वैश्य का उल्लेख है कि उसके दो पुत्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कर गये। इससे क्या संकेत मिलता है?'
'इसे आरक्षण के 'प्रयास' पक्ष से जोडा जा सकता है। आरक्षण को दलित-वंचित केलिए ऐसा अवसर बनाया गया था जिसके सहारे वह अपनी योग्यता सिद्ध कर सके, अपनी मंद क्षमता को तीव्र गति दे कर सामान्य दीर्घा में स्थान पा सके।'
'इसी संदर्भ की प्राचीन कथा है: किसी के चार पुत्र थे। सबका लालन-पालन एक ही रीति तथा संसाधन से, समान परिवेश में हुआ। युवा पुत्रों को प्रवृत्ति और क्षमता के अनुसार दायित्व सौंपे गये। एक अध्यापक, दूसरा सुरक्षा अधिकारी, तीसरा वित्तीय प्रभारी बना और चौथे को सेवा व्यवस्था का प्रभार दिया गया। याने सहोदर भाई अलग-अलग वर्ण में प्रविष्ट हुए।'
'इसमें ऊँच-नीच की तो कोई बात नहीं उठी !'
विभेद को लेकर व्यक्तिगत और सामाजिक दृष्टिकोण भिन्न होता है। प्रतिष्ठा का मापदंड सामाजिक संदर्भ में तैयार होता है। आदि काल से ही अध्यापन अधिक सम्मानीय कार्य माना जाता रहा है। 'शिक्षा' समाज का नैतिक उत्तरदायित्व बन गया था। व्यक्ति चाहे किसी भी वर्ण या वर्ग का हो, उसे उसका शिक्षक ही सँवारता-तराशता था। भारत में शिक्षक को माता-पिता के समकक्ष सम्मान देने की परम्परा है। इसमें द्विपक्षीय उदात्तता है; शिक्षक भी अपने शिष्य को अपने से बडा पाकर ईर्ष्याग्रस्त नहीं होता। कवियों ने तो गुरु को 'गोविन्द' के सामने भी प्रथम-पूजनीय बताया है। बाद में जब अध्यापन को व्यवसाय बना दिया गया, तब इसकी प्रतिष्ठा में कमी आ गयी। इसके अलावा, भौतिकता के बढते महत्त्व के कारण भी अध्यापक को अपनी जगह छोडनी पडी। फिर भी इसमें सत्कीर्ति तथा सम्मान तो अभी भी है।'
'वर्ण व्यवस्था के साथ एक और ध्यान देने की बात है कि आज जिसे हम उच्च वर्ग कहते हैं, उसके लिए कठिन नियम निर्धारित थे; उन्हें संकल्पित मानक पर खरा उतरना होता था।'
'उन्हें विशेषाधिकार भी तो था !'
'परन्तु इसका अधिकारी होने केलिए वर्ण के अनुरूप क्षमता तथा तपस्या अनिवार्य थी। आचरणगत नीतियों का पालन करना था। शील के व्यवहारगत नियमों को अत्यन्त गंभीरता तथा पारदर्शिता से साधा जाता था। ब्राह्मण का उत्तरदायित्त्व उसकी योग्यता एवं तप के अनुरूप था, साथ ही उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह स्वयं सत्पथ पर चलते हुए उत्तम विचारों तथा संदेशों से सदैव देश, समाज और शासक का मार्ग दर्शक बना रहेगा, उसके द्वारा पवित्रता के श्रेष्ठतम नियमों का पालन किया जायेगा। शुचिता का आदर्श प्रस्तुत करने के साथ ही वह निपुण वैज्ञानिक भी होगा। वह धर्मविद तो होगा ही, उसमें भविष्यवाणी की भी योग्यता होगी। वीर क्षत्रिय के उत्तरदायित्त्व का आधार मुख्यत: उसका बाहुबल था, उसकी संकल्प-शक्ति इतनी सघन होगी कि चाहे कितना भी पारिवारिक या भावनात्मक दबाव हो, वह देश-हित में अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करेगा। वह किसी मोह से ग्रस्त नहीं होगा; उसके लिए अपना कर्तव्य ही सर्वोपरि रहेगा। वैश्य पर देश के प्राकृतिक तथा मानवकृत ऐश्वर्य के संरक्षण-संवर्धन का उत्तरदायित्व था। समाज को स्वस्थ-सम्पन्न बनाये रखने वाले व्यवहर्ता से यह अपेक्षा थी कि वह समाज तथा साम्राज्य की सम्पत्ति का अभिरक्षक होकर भी उससे निर्लिप्त रहेगा और दानशीलता का चरम आदर्श प्रस्तुत करेगा। धर्मनिष्ठ श्रेष्ठी से ही यह अपेक्षा थी कि वह मानव, मानवेतर प्राणियों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहते हुए देश तथा समाज को सुरुचिपूर्ण बनाये रखेगा। अब बात आती है सेवा प्रभारी की; उसका ज्ञानी-विज्ञानी या पराक्रमी योद्धा या वित्तपटु पर्यावरणविद होना आवश्यक नहीं था। योग्यता की ऊचाइयाँ अध्यापक, रक्षक तथा श्रेष्ठी केलिए अनिवार्य थीं; सेवा प्रभारी से मात्र विनम्रता की अपेक्षा की जाती थी। वह जीवन के अनेक दुरूह नियमों से भी मुक्त था। उसे योग्यता की कठिन परीक्षाओं से तो नहीं ही गुजरना था, उसकी कार्य-कुशलता भी स्वनिर्मित ही हुआ करती थी। परन्तु उसके अधिकार क्षेत्र में वह अवसर तो था ही कि अपने नियत कर्म के माध्यम से अपनी सुप्त क्षमताओं को जगा कर विशिष्टता विकसित कर ले और तदनुसार किसी उच्च दीर्घा में स्थान पा जाये। इसे 'तप' कहा जाता था। तप के द्वारा होने वाला आंतरिक विकास बाह्य प्रतिष्ठा को व्यक्तित्व के अनुकूल बनाता था। यह आदर्श व्यवस्था अंतर से बाह्य को जोडने वाली थी।'
'अब तो इसका भग्नावशेष भी दिखाई नहीं देता।'
'हाँ, कालान्तर में विकृतियाँ आ गयीं।'
'जब किसी ज्ञानी-गुणी ब्राह्मण का मूर्ख-लंपट बेटा ब्राह्मणत्व को अपनी बपौती मानने लगा, कोई कायर क्षत्रियसुत अपने पराक्रमी पिता के घोडे पर उचक कर बैठ गया, दानी वैश्य का लोभी बेटा पिता द्वारा राज्य के संरक्षित धन को हडप कर भी पिता के ही समान श्रेष्ठी बनने का दावा करने लगा, सेवा परायणता को हेय मान कर बिना योग्यता के ही सेवक-सुत ऊँची दीर्घा में बैठने की हठधर्मी पर उतर आया तब विकृतियाँ शुरू हुईं और होती चली गयीं। इस गिरावट में वह अवसर कहाँ रहा कि कोई वा्तुत: नीचे की दीर्घा से ऊपर आ सके? ऐसे में क्षमतावान 'वर्ण-पुरुष' को चिह्नित करना असंभव हो गया।'
'उस प्राचीन कालखण्ड में अधिकांशत: परिवार में ही शिक्षा ग्रहण करने की रीति थी। गुरुकुलों में जाने वालों की संख्या अल्प थी। पिता से शिक्षित होकर युवा पुत्र द्वारा पैतृक परम्परा को आगे बढाना स्वाभाविक था। ज्ञान अथवा कुशलता के हस्तांतरण पर वंशवाद का आक्षेप नहीं लगता था; बल्कि यह अपेक्षा की जाती थी कि पुत्र पिता को प्रतिष्ठा देकर नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।'
(जारी....)
इसमें ऊँच-नीच की तो कोई बात नहीं उठी !'
'वर्गभेद को लेकर व्यक्तिगत और सामाजिक दृष्टिकोण भिन्न होता है। प्रतिष्ठा का मापदंड सामाजिक संदर्भ में तैयार होता है। आदि काल से ही अध्यापन अधिक सम्मानीय कार्य माना जाता रहा है। 'शिक्षा' समाज का नैतिक उत्तरदायित्व बन गया था। व्यक्ति चाहे किसी भी वर्ण या वर्ग का हो, उसे उसका शिक्षक ही सँवारता-तराशता था। भारत में शिक्षक को माता-पिता के समकक्ष सम्मान देने की परम्परा है। इसमें द्विपक्षीय उदात्तता है; शिक्षक भी अपने शिष्य को अपने से बडा पाकर ईर्ष्याग्रस्त नहीं होता। कवियों ने तो गुरु को 'गोविन्द' के सामने भी प्रथम-पूजनीय बताया है। बाद में जब अध्यापन को व्यवसाय बना दिया गया, तब इसकी प्रतिष्ठा में कमी आ गयी। इसके अलावा, भौतिकता के बढते महत्त्व के कारण भी अध्यापक को अपनी जगह छोडनी पडी। फिर भी इसमें सत्कीर्ति तथा सम्मान तो अभी भी है।'
'वर्ण व्यवस्था के साथ एक और ध्यान देने की बात है कि आज जिसे हम उच्च वर्ग कहते हैं, उसके लिए कठिन नियम निर्धारित थे; उन्हें संकल्पित मानक पर खरा उतरना होता था।'
'उन्हें विशेषाधिकार भी तो था !'
'परन्तु इसका अधिकारी होने केलिए वर्ण के अनुरूप क्षमता तथा तपस्या अनिवार्य थी। आचरणगत नीतियों का पालन करना था। शील के व्यवहारगत नियमों को अत्यन्त गंभीरता तथा पारदर्शिता से साधा जाता था। ब्राह्मण का उत्तरदायित्त्व उसकी योग्यता एवं तप के अनुरूप था, साथ ही उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह स्वयं सत्पथ पर चलते हुए उत्तम विचारों तथा संदेशों से सदैव देश, समाज और शासक का मार्ग दर्शक बना रहेगा, उसके द्वारा पवित्रता के श्रेष्ठतम नियमों का पालन किया जायेगा। शुचिता का आदर्श प्रस्तुत करने के साथ ही वह निपुण वैज्ञानिक भी होगा। वह धर्मविद तो होगा ही, उसमें भविष्यवाणी की भी योग्यता होगी। वीर क्षत्रिय के उत्तरदायित्त्व का आधार मुख्यत: उसका बाहुबल था, उसकी संकल्प-शक्ति इतनी सघन होगी कि चाहे कितना भी पारिवारिक या भावनात्मक दबाव हो, वह देश-हित में अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करेगा। वह किसी मोह से ग्रस्त नहीं होगा; उसके लिए अपना कर्तव्य ही सर्वोपरि रहेगा। वैश्य पर देश के प्राकृतिक तथा मानवकृत ऐश्वर्य के संरक्षण-संवर्धन का उत्तरदायित्व था। समाज को स्वस्थ-सम्पन्न बनाये रखने वाले व्यवहर्ता से यह अपेक्षा थी कि वह समाज तथा साम्राज्य की सम्पत्ति का अभिरक्षक होकर भी उससे निर्लिप्त रहेगा और दानशीलता का चरम आदर्श प्रस्तुत करेगा। धर्मनिष्ठ श्रेष्ठी से ही यह अपेक्षा थी कि वह मानव, मानवेतर प्राणियों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहते हुए देश तथा समाज को सुरुचिपूर्ण बनाये रखेगा। अब बात आती है सेवा प्रभारी की; उसका ज्ञानी-विज्ञानी या पराक्रमी योद्धा या वित्तपटु पर्यावरणविद होना आवश्यक नहीं था। योग्यता की ऊचाइयाँ अध्यापक, रक्षक तथा श्रेष्ठी केलिए अनिवार्य थीं; सेवा प्रभारी से मात्र विनम्रता की अपेक्षा की जाती थी। वह जीवन के अनेक दुरूह नियमों से भी मुक्त था। उसे योग्यता की कठिन परीक्षाओं से तो नहीं ही गुजरना था, उसकी कार्य-कुशलता भी स्वनिर्मित ही हुआ करती थी। परन्तु उसके अधिकार क्षेत्र में वह अवसर तो था ही कि अपने नियत कर्म के माध्यम से अपनी सुप्त क्षमताओं को जगा कर विशिष्टता विकसित कर ले और तदनुसार किसी उच्च दीर्घा में स्थान पा जाये। इसे 'तप' कहा जाता था। तप के द्वारा होने वाला आंतरिक विकास बाह्य प्रतिष्ठा को व्यक्तित्व के अनुकूल बनाता था। यह आदर्श व्यवस्था अंतर से बाह्य को जोडने वाली थी।'
'अब तो इसका भग्नावशेष भी दिखाई नहीं देता।'
'हाँ, कालान्तर में विकृतियाँ आ गयीं।'
'जब किसी ज्ञानी-गुणी ब्राह्मण का मूर्ख-लंपट बेटा ब्राह्मणत्व को अपनी बपौती मानने लगा, कोई कायर क्षत्रियसुत अपने पराक्रमी पिता के घोडे पर उचक कर बैठ गया, दानी वैश्य का लोभी बेटा पिता द्वारा राज्य के संरक्षित धन को हडप कर भी पिता के ही समान श्रेष्ठी बनने का दावा करने लगा, सेवा परायणता को हेय मान कर बिना योग्यता के ही सेवक-सुत ऊँची दीर्घा में बैठने की हठधर्मी पर उतर आया तब विकृतियाँ शुरू हुईं और होती चली गयीं। इस गिरावट में वह अवसर कहाँ रहा कि कोई वा्तुत: नीचे की दीर्घा से ऊपर आ सके? ऐसे में क्षमतावान 'वर्ण-पुरुष' को चिह्नित करना असंभव हो गया।'
'उस प्राचीन कालखण्ड में अधिकांशत: परिवार में ही शिक्षा ग्रहण करने की रीति थी। गुरुकुलों में जाने वालों की संख्या अल्प थी। पिता से शिक्षित होकर युवा पुत्र द्वारा पैतृक परम्परा को आगे बढाना स्वाभाविक था। ज्ञान अथवा कुशलता के हस्तांतरण पर वंशवाद का आक्षेप नहीं लगता था; बल्कि यह अपेक्षा की जाती थी कि पुत्र पिता को प्रतिष्ठा देकर नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।'
'माता-पिता या परिवार जन से ज्ञान, शिल्प, कौशल आदि विरासत में पाना स्वाभाविक तथा शुभ है। पारिवारिक व्यवसाय को जीविका का साधन बनाना भी सहज स्वीकार्य है। आपत्ति का कारण है अयोग्य संतान द्वारा पैतृक प्रतिष्ठित थाती को नाहक भुनाना।'
यह क्या 'वर्ण' से 'वर्ग' में अपवर्तन की कथा है?'
'नहीं, यह इतनी सरल बात नहीं है। जब वर्ण 'जन्म' के अधीन हो गया, तब उसके अपने नियम-कायदे बन गये। वर्ण में निहित आध्यात्मिक उन्नयन का उद्देश्यपूर्ण तत्त्व सतह पर विस्मृत-सा हो गया। 'सतह' इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि व्यक्ति की अंतरात्मा में उन्नयन की खंडित प्रक्रिया उसके अनजाने भी मंदगति से चलती रहती है। पूर्ण तथा द्रुत उन्नयन तभी होता है जब व्यक्ति इसके प्रति सजग और सहमत हो। वहाँ तो विपरीत स्थिति बन गयी; वर्ण की ऊर्ध्वगामी नमनीयता को स्थगित कर पारिवारिक रूढियों की गाँठे व्यक्ति के विकास के आडे आने लगीं। वर्ण की आंतरिक श्रेष्ठता और व्यक्ति के स्वभावगत गुणशील में संगति का अभाव परिलक्षित होने लगा।'
'एक वर्ण में अनेक जातियां बन गयीं।'
'अनेक नही, अनगिनत। बनती चली गयी।'
'कौन था इनका निर्माता?'
'यह किसी एक व्यक्ति या एक कालखण्ड की रचना नहीं है। इसे परिभाषित करने में भी मनमानी की गयी है। वर्ण के समान स्पष्ट श्रृंखला जाति में नहीं है। इसकी संरचना का ताना-बाना बेहद उलझा हुआ है। इसे जीववैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने की कोशिश की जाती है, परन्तु उसमें भी पूर्ण शुद्धता की कमी है। हालाँकि विश्व के मानव-वैज्ञानिक मानते हैं कि भारत का जाति वर्गीकरण विश्व की सबसे प्राचीन समाज-व्यवस्था है। और, सबसे आश्चर्यजनक है उस पर कायम रहने का सफल सामाजिक प्रयास। आचरणगत धर्म, परिवार, परम्परा तथा परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखने वाला भारतीय अपनी जाति से भी प्रेम करता है और उसके प्रति निष्ठावान रहने को अपना कर्तव्य मानता है।'
'ऐेसे में 'जाति-मुक्त' समाज की कल्पना कितनी फलदायी और साथर्क है?'
'फल भविष्य के गर्भ में है, परन्तु यह कल्पना निरर्थक नहीं है। इसकी सम्भूति सम्भव है?'
'कैसे?'
'शिशु माँ का दूध पीना बन्द नहीं करना चाहता, परन्तु समय पर उसे छोडना पडता है। इससे माँ के दूध की महत्ता में कोई कमी नहीं आती। वह प्रारंभिक पेय व्यक्ति की जीवन रक्षा और में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन उसे छोडने के बाद ही वह अन्य पौष्टिक पदार्थों को अपनाने में समर्थ हो पाता है।'
'तब तो 'जातिप्रथा' को दोष देना गलत है !'
'
ॐ सुधा सिन्हा -- विद्वेष का कारिन्दा 11.06.2020
विद्वेष का
विश्वव्यापी महामारी के कारण भले ही वाणिज्य-व्यापार में मंदी
आ गयी हो, परन्तु विद्वेष के बाजार की गर्मी नहीं कमी है।
विद्वेष का अधम कारोबारीराजनीति और अर्थभीति से लेकर
भौगोलिक रेखाओं को भी अपना raw material बना रहा है।
विद्वेष की मंडी में विद्वेषनिपुण कारिन्दे अपने को बुद्धिजीवी
बता कर अच्छी कीमत पर उठने के जुगाड मे लगे रहते हैं।
बेहिचक झूठ बोलने वाले विद्वेषपटुओं को टुटपुँजिआ पार्टियां
अपना प्रवक्ता तथा संवाददाता बनाती हैं।
राजनैतिक पार्टियां किसी-न-किसी सिद्धान्त पर चलती हैं।
उनमें पक्ष-विपक्ष कर होना स्वाभाविक है। परन्तु विद्वेष के
सिद्धान्त पर चलने वाला पक्षहीन साम्यवाद स्वभाव-चरित्र-
विचार-आचार में केवल विपक्षी बना रहता है। वर्तमान समय में
इसका अपना घर है चीन का कुटिल शासनतंत्र। यदि शरीर में
कोई विकार उत्पन्न हो जाये तब रोगाणुओं को सेंधमारी का
मौका मिल जाता है।राजनीति के क्षेत्र में साम्यवाद ऐसा ही
रोगाणु है जो घुसपैठ के फिराक में लगा रहता है।
मुसलमान-ईसाई हस्तक्षेप से मुरझा रहे भारत के राष्टभक्त
जनगण ने जान पर खेल कर मातृभूमि केलिए आजादी हासिल
की। उस मुहूर्त में आवश्यकता थी एक राष्ट्रप्रेमी नेता की। परन्तु
दुर्भाग्य से जनमत के विरुद्ध प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में
युरोपियन स्वभाव और मुसलमानी संस्कार वाले जबाहरलाल को
लाद दिया गया; तब साम्यवादी वाइरस के लायक पंकिल जमीन
तैयार होने लगी। जबाहरलाल व्यक्ति से परिवार बन कर भारत
की छाती पर मूंग दलने लगे। नेतृत्व की इस दुर्घटना के कारण
भारत की स्वतंत्रता के प्रारंभिक पैंसठ वर्ष तो बरबाद हुए ही,
उजाले बाँट दो
2
जनगण को जिन आनुसंगिक हानियों का सामना करना पडा
वह अब तक पीछा नहीं छोड रही हैं। हिन्दुत्व की अवहेलना से
देश हतप्रभ हो गया। मुसलमानतुष्टिकरण और ईसाई रेलिजन
फैलाने की छूट ने देश की डेमोग्राफी बिगाड कर रख दी।
कांग्रेस पार्टी ब्रितानियों की सत्ता बचाने केलिए बनायी गयी थी।
आजाद भारत में इसकी प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी थी।
परन्तु भारतीय स्वतंत्रता को निरर्थक बनाने की कुटिल मंशा से
इस पार्टी ने अपने को विद्वेष के कारिन्दे तैयार करने का
कारखाना बना लिया। दिखाने केलिए कांग्रेस और साम्यवादी
पार्टियां भले ही भिन्न हों, परन्तु भारत को पतन के गर्त में
गिराने की कुचेष्टा के पीछे दोनों की मिलीभगत रही। अधिक-
से-अधिक विद्वेषी तैयार करने के उद्देश्य से कांग्रेस ने
साम्यवादियों को इस धंधे का मुख्य भाग outsource कर
दिया। विद्वेषगुरु साम्यवादी के भारतीय संस्करण ने पूरी
सक्रियता से माओवादी आतंकी, नक्सलवादी हत्यारे, पाखंडी
अर्बन नक्सलाइट, नक्काल इतिहासकार, जेएनयू जैसे माँद और
खच्चरों के टुकडे-इुकडे गैंग तैयार कर दिये। इस गैंग में शामिल
होने की एक ही शर्त थी--
जो घर जारै आपनो चले हमारे साथ ।
*
मारने वाले से बचाने वाले का हाथ मजबूत होता है। और,
बचाने वाली शक्ति को पता है कि वह मानवता के बीज का
संरक्षण कर रही है। वह शक्ति विद्वेष के कारिन्दों के पीछे पड
कर अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करती; उन्हें आत्महत्या
कर लेने की सुविधा देकर छोड देती है।
ॐ11.06.2020 सुधा 9047021019
ॐ सुधा सिन्हा -- संज्ञापन बदलें change the narrative 04.06.2020
संज्ञापन बदलें
change the narrative
बार-बार यह राजनैतिक कथन सुन कर ऊब होने लगी है --
भारत के मुसलमानों को चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है !! क्या
मतलब है इस कथन का ? यह विधान किसने बनाया कि
हिन्दुओं के हिस्से में चिन्ता और मुसलमानों के हक में
निश्चिन्ता रहे ? रूढिबद्ध संज्ञापन stereotype narrative की
आदत से बाहर निकलना बहुत जरूरी है। साथ ही यह संदेश
देना है कि मुसलमानों को चिन्ता तो करनी ही होगी, साथ ही
उन्हें अपनी चिन्ताओं का विषय बदलना होगा।*
यह मत समझें कि मुसलमान को कोई चिन्ता नहीं है; वह तो
दिन-रात इस सोच में डूबा रहता है कि भारत क्यों नहीं
मुसलमानी देश बना। उस पर, जब से कश्मीर धारा 370 के
चक्रचाल से निकल गया तब से हिन्दू मूल के भारतीय
मुसलमान का रक्तचाप बढता ही जा रहा है। और, श्रीराम
मंदिर निर्माण पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद
तो भारत से लेकर पाकिस्तान तक का बाबरजादा मुसलमान
उस शापग्रस्त साँप की तरह तडप रहा है जो अपने ही विष की
आँच से झुलसने को मजबूर हो जाता है। अपने वास्तविक
पूर्वजों के प्रति मुसलमान जितना संवेदनहीन है, संतान के प्रति
भी उतना ही बदकार है। आज के भारतीय मुसलमान के दादा-
परदादा के गले पर छुरी रख कर कलमा पढाया गया इसका
अनलिखा इतिहास सर्वविदित है। खून का घूंट पीकर जो
मुसलमान बनने को मजबूर हुआ, उसका वंशज स्वयं तो अपने
पूर्व पुरुषों को प्रताडित करने वाले दरिंदों का गुलाम बना ही
हुआ है, तावडतोड गुलाम भी पैदा करता जा रहा है। सारे संसार
उजाले बाँट दो
2
में मुसलमान नामक सम्प्रदाय ने मानव शरीर में दानव तैयार
करने का कारखाना बैठा रखा है।
*
भारत का मुसलमान चिन्ता करे-यह होगा बदला हुआ narrative।
भारत की सीमा के अंदर रह कर भारतीय सनातन संस्कृति
औेर हिन्दुत्व हनन को अपना रेलिजन मानने वाले मुसलमान
को अपने अस्तित्व पर खतरे की चिन्ता करनी होगी। भारत
की बरबादी की दुआ माँगने वाले मुसलमान को जेल जाने
केलिए तैयार रहना होगा। संसार भर में फैले आतंकियों का
होस्ट बनने की भूल करने वाला भारतीय मुसलमान भारत के
कानून से बचने की उम्मीद न करे। दिमाग इस्तेमाल करने की
चीज है, यह समझे। अपने औकात से बाहर निकलने की
कुचेष्टा करना मुसलमान केलिए खतरनाक होगा। वह याद रखे
कि अगर ''अब्दुल कलाम'' बनेगा तो भारतमाता उसे अपना
सम्मानित पुत्र मान कर राष्ट्रपति के पद पर बैठा सकती हैं।
परन्तु यदि वह राष्ट्रघाती अफजलगुरू बनेगा तो फाँसी के फंदे
से नहीं बचेगा।
*
भारत सरकार समान आचार संहिता लागू कर मुसलमानों की
बदचलनी पर कानूनी रोक लगाये।
ॐ04.06.2020 सुधा 9047021019
सुधा सिन्हा -- अज्ञानी विद्वेषी को उत्तर 14.10.2019
अज्ञानी विद्वेषी को उत्तर
किसी व्यक्ति को उत्तर देने की कोई बाध्यता मेरे साथ
नहीं है। यह भी नहीं कि मैं विद्वेषी का हृदय परिवर्तन
करना चाहती हूँ। और, यह भी सम्भव नहीं है कि
अज्ञानी मेरी सुन कर ज्ञानी बन जाये।
मेरी प्रतिश्रुति अपनी मातृभूमि केलिए है। इसकी
प्रतिष्ठा के विरुद्ध खुले थोभरे, उठे पंजे और बढे खुर पर
मुझे शल्य प्रहार करना है।
*
अति प्राचीन काल से ही भारत(भा=प्रकाश+रत=लीन) में
शब्दों, विशेष कर संज्ञाओं द्वारा सूक्षता को अभिव्यक्त
किया गया है; यहाँ नाम सार्थक होते हैं। पश्चिम ''लैंड''
से आया हुआ निरर्थक अंटी-बंटी तो ब्रायन के कबाड
की तरह ही अंट-संट ''न्यू'' है ''जी''!! यह अर्थरहित
ब्रायन नामक कौआ है कौन? उसका अपनाम, करोडों
भाग्यशाली भारतीयों ने मेरी ही तरह नहीं सुना होगा।
आपने अजामिल की कथा सुनी होगी; कहा जाता है कि
वह कभी भगवान को याद नहीं करने वाला परले सिरे
का पापी था। कथा में ''पापी'' शब्द का ही प्रयोग हुआ
है। (ब्रायन ऐसा नाम दे सकता है जो सोशल मीडिया में चालू हो।)
हाँ, तो कथा आगे बढती है: अजामिल के बेटे का नाम
था नारायण;(यह भगवान विष्णु के सहस्र नामों में एक है)।
माँग रही है भारतमाता
2
जैसे लोग मरते हैं, ठीक वैसे ही अजामिल मर रहा
था; पुत्रप्रेमग्रस्त अजामिल ने बिछडते समय कातर स्वर
में बेटे को पुकारा--नारायण नारायण ! कथा के अंत में
कहा जाता है कि अजामिल ''तर'' गया। यहाँ यह
उल्लेख करना जरूरी है कि अजामिल ने भगवान विष्णु
को कभी ब्रायनमार्का उत्कोच नहीं दिया था।
मूर्ख ब्रायन को कोई समझदार ''तरने'' की आध्यात्मिक
प्रक्रिया का रहस्य समझा दे तो सौ छेदों वाली डेंगी पर
सवार यह अज्ञानी छिद्रान्वेषी भी ''तर'' जा सकता है।
हालाँकि जो केवल मूर्ख है उसके उद्धार की सम्भावना
रहती है, लेकिन जो मूर्ख अपने सिवा सबको मूर्ख
समझता हो उसकी सफलता संदेहास्पद है।
क्या ब्रायन नहीं जानता कि भारत में स्कूल खोलने के
पीछे यूरोपियनों की असली मंशा क्या थी? वह चालाकी
से ''ईसाई'' शब्द का प्रयोग नहीं करता है;1400 साल
तो कहता है लेकिन 2019 नहीं कहता। यह जानी हुई
बात है कि 1400 साल वालों ने 2019 वालों से ही
सीखा कि किस तरह देवत्व को सूली पर चढा कर
हत्यारों, बलात्कारियों, समलैंगिकों, जर-जमीन-जायदाद
हडपने वालों की फौज खडी की जाती है। टुच्चे ब्रायन
की बन्द समझ में यह बात कैसे घुसेगी कि हिन्दू
जहाँ जाता है वहाँ मंदिर क्यों बना देता है !! किसी
माँग रही है भारतमाता
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आध्यात्मिक-सांस्कृतिक रहस्य की बात बेहूदे ब्रायन के
निम्नस्तरीय दिमाग पर उसी तरह बेअसर हो जायेगी
जैसे चंडीपाठ सुनाने के बाद भी कुत्ते का कुत्तापन दूर
नहीं होता। कहा गया है--
मूरख हृदय न चेत जौं गुरु मिलहिं विरंचि सम।
फूलहिंफलहिं न बेंत जतपि सुधा बरसहिं जलद।।
मध्ययुग का अवशेषजन्तु ब्रायन भारत को कम युद्ध
करने केलिए निन्दनीय मानता है; इस कूडमगज को
पता ही नहीं है कि संसार इक्कीसवीं सदी में जहाँ
घिसटते-घिसटते पहुँचने की कोशिश में है, भारत के
कदम उस मुकाम को कब के चूम चुके हैं। यह कोई
संयोग की बात नहीं है कि United Nations के Peace
Keeping Force में भारतीय पराक्रमी वीरों की उपस्थिति
सबसे अधिक है। यह Force बर्बरों की तरह युद्ध करने
केलिए नहीं, बल्कि युद्ध रोकने केलिए है। अवतारों ने
चेतना के शीर्ष ''अयोध्या'' स्तर तक भारत को अति
प्राचीन काल में ही पहुँचा दिया है। इस देवभूमि को यह
भी पता है कि युद्ध को भी ''कर्मयोग'' मान कर उस
''जय'' तक पहुँचना ही है जिसमें स्वयं भगवान की
विभूति है।
प्राग्ऐतिहासिक काल के दानवों की अमानुषिकता के
साथ 1400 और 2019 वालों के क्रूर पाशविक चरित्र
माँग रही है भारतमाता
4
की तुलना की जा सकती है। लहलहाते संसार पर जब
ये अशुभ टिड्डी दल टूट पडे, उसके पहले उन जगहों में
कौन और क्या था इसका नामोनिशान नहीं बच पाया।
शुद्ध-प्रबुद्ध भारत की ओर भी 1400 और 2019 वाले
पागल भैंसे की तरह बढे, हानि भी पहुँचा दी। आपने
देखा होगा कि मार कर भगाया गया आवारा कुत्ता जाते-
जाते हग-मूत देता है। भारतीय संस्कृति के सामने थोथे
पडे 1400 और 2019 वालों का चाल-चरित्र भी वही
था। अब दोनो rejected अपआकांक्षी भारत के आईने में
अपना ही चेहरा देख कर ताली पीटने लगते हैं--देखो,
कितना कुरूप है भारत। वे अपनी बदसूरती नहीं
पहचानते। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि भारत का
ऐश्वर्य उन्हें नहीं दीखता, क्योंकि इसे चुराने या हडपने
की उनकी चालों की पोल तो खुलती ही रही है।
संसार का तात्विक सौंदर्य निगल कर 1400 और
2019 वालों ने अपनी बदसूरती की जडें जमायी हैं।
सौम्यता के साथ मानवक्रमविकास विश्व भर में
प्राकृतिक रूप से विकसित होता रहा था। ईशविरोधी
1400 और 2019 वाले खच्चरपतियों (खच्चर इनका
एकमात्र यान था) की नकारात्मकता ने अपने क्षेत्रों में
देवत्व उतरने की प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया। इतना
ही नहीं, वे संसार भर में मानवता के बीच पनपने वाले
माँग रही है भारतमाता
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देवत्व को ढूंढ-ढूंढ कर रौंदने लगे। अपनी हिंस्रप्रवृत्ति के
साथ सूली-तिकठी, चाकू-छुरा, गँडासा-हँसिया लेकर
पाशविकता की गहन खेती करने लगे। इन्होंने अपनी
''सल्तनत'' और अपना ''राज'' कायम कर, संसार को
मजबूर किया कि सब विध्वंशक नीति-उपाय-यंत्र-रसायन
तैयार करने की होड में शामिल हो जायें। 1400 और
2019 के वर्चस्व ने संसार को विनाशक जिंसों की
खतरनाक मंडी बना कर रख दिया; युद्धसामग्री ही
नहीं अन्न तथा रोगहरऔषध तक को मानव विनाश का
संसाधन बनाया गया।
परन्तु भारत की अयोध्या शक्ति के सामने ''सल्तनत''
और ''राज'' की नहीं चल पायी। लतिआये गये वंश के
पूत ब्रायन के ज्वरोन्माद का असली कारण है 1400
और 2019 वालों के प्रत्यक्ष-परोक्ष हर तरह की साजिशों
को भारतीय संस्कृति द्वारा निरस्त कर दिया जाना।
''सल्तनत'' और ''राज'' का भ्रष्टाचार, दुराचार, व्यभिचार
भारतीय संस्कृति को तो नहीं मिटा पाया परन्तु सतह
पर गंदगी फैला गया।
भारत अपना फर्श साफ करने में लगा है, विकृतियां
सुधार रहा है;गंदगी दूर करने का उसका संकल्प सिद्धि
की ओर बढ चुका है। 1400 और 2019 वालों के संसर्ग
जन्य अभिशापों में एक है नशा करने की लत;
माँग रही है भारतमाता
6
क्रमबद्ध सफाई अभियान में भारत इस कूडे को भी
साफ कर देगा। ब्रायन को इस से जरूर असुविधा होगी
क्योंकि उसके God Zone की स्थिति यह है---
New Zealand is very much a drinking culture . There’s
is a lot attached to the simple act of having a beer with
a friend or workmate. Saying that, no judgement is
passed on anyone who doesn’t drink, but the
teetotaller traveller should understand that booze and
Kiwis go together like fish ‘n’ chips. Even if you don’t
drink, if you’re invited to a dinner party or barbecue, it’s
good form to bring a bottle of wine or some beers to
share. If someone “shouts” you a drink at a bar, then
custom dictates that you get the next round in.
दरअसल, जिसने भारत के जीवन को नहीं जिया है,
नहीं बसा यह देश कि जिसकी प्राणवायु में.....
उन अभागे जारज ब्रायनों की बेहूदी बातों का कोई
मूल्य नहीं है।
ॐ
14.10.2019
सुधा,9047021019
सुधा सिन्हा -- संस्कार और संस्कृति 07.08.2017
07.08.2017
संस्कार और संस्कृति
संस्कृति समाज को सूक्ष्म
पीठाश्रय प्रदान करती है। सौभाग्य से भारत को
ऐसी संस्कृति का सम्बल प्राप्त है जिसकी
निर्विवाद दीर्घ प्राचीनता में अक्षुण्ण जीवन्तता है।
क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर को अपनी मुट्ठी में
लेकर चलने वाली इस सुभग संस्कृति में संस्कारों
की श्रृंखला है। माता के गर्भ में उपस्थित होने से
लेकर देहत्याग के बाद भी संस्कारों का स्पर्श हमें
भारतीयता प्रदान करता रहता है; ऐसी सनातन
भारतीयता जिसमें निहित निरन्तरता हमें
जन्मजन्मान्तर तक विकसित होने का सुअवसर
देती रहती है।
ख्रिस्तानी-मुसलमानी-अनजानी-पहचानी अपशक्तियों
ने इस संस्कृति से टकराने की भूल की; कुछ
अज्ञानवश तो कुछ विद्वेशवश ! कुछ के अज्ञान
दूर हुए तो कुछ के सिर फूटे। परन्तु स्वभाव से
निरहंकारी इस संस्कृति ने न तो अपने गुरुत्व का
और न अपनी शक्ति का ढिंढोरा पीटा। पूर्ण से
निकल कर अक्षर पूर्णता में निवास करने वाली
माँग रही है भारतमाता
2
इस संस्कृति ने मूढ अवहेलनाओं की चिन्ता नहीं
की; इसी ने संसार को बताया है कि अंतत: सत्य
की ही विजय होती है।
भारतीय संस्कृति की प्रकृति में ऐसी स्वचालित
आत्मसंशोधकता निहित है जिसकी छुअन विचलन
से उबारती है। इसकी सजग स्फूर्त चलिष्णुता सभी
सकारात्मक तत्वों को अपने में समेट लेती है।
*
जो किसी विवशता या भूल के कारण इससे कट
गये, या जिनका जन्म ही अन्य सांस्कृतिक क्षेत्र
में हुआ--उन्हें भी यह संस्कृति मातृसुलभ तत्परता
से अपने कोमल क्रोड में स्थान देती है। भारत में
पवित्र संस्कार-सृजन की परम्परा है;इसे बनाये
रखने की आवश्यकता है।
ॐ
सुधा(जन्मतिथि-21.11.1933)
सम्पर्क 9047021019
Monday, March 28, 2016
VC Conference proposal
Iam sending a draft on subject about conference of vice-chancelars of allover india at pune. pleas check it and replay on that subject.
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11/7/10
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not readable. It came as junk. What font do u use ?
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